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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
स रुद्रो दानवान्हत्वा कृत्वा धर्मोत्तरं जगत् |  ६२   क
रौद्रं रूपं विहाय़ाशु चक्रे रूपं शिवं शिवः ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति