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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
विष्णुर्मरीचय़े प्रादान्मरीचिर्भगवांश्च तम् |  ६५   क
महर्षिभ्यो ददौ खड्गमृषय़ो वासवाय़ तु ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति