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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
महेन्द्रो लोकपालेभ्यो लोकपालास्तु पुत्रक |  ६६   क
मनवे सूर्यपुत्राय़ ददुः खड्गं सुविस्तरम् ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति