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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्मसेतुमतिक्रान्ताः सूक्ष्मस्थूलार्थकारणात् |  ६८   क
विभज्य दण्डं रक्ष्याः स्युर्धर्मतो न यदृच्छय़ा ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति