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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रतर्दनादष्टकश्च रुशदश्वोऽष्टकादपि |  ७९   क
रुशदश्वाद्भरद्वाजो द्रोणस्तस्मात्कृपस्ततः |  ७९   ख
ततस्त्वं भ्रातृभिः सार्धं परमासिमवाप्तवान् ||  ७९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति