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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
कृत्तिकाश्चास्य नक्षत्रमसेरग्निश्च दैवतम् |  ८०   क
रोहिण्यो गोत्रमस्याथ रुद्रश्च गुरुरुत्तमः ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति