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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
क्षीणाय़ुधे सात्वते युध्यमाने; ततोऽव्रवीदर्जुनं वासुदेवः |  ४२   क
पश्यस्वैनं विरथं युध्यमानं; रणे केतुं सर्वधनुर्धराणाम् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति