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वन पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
देशं विरजसं पश्य मेरोः शिखरमुत्तमम् |  १६   क
यत्रात्मतृप्तैरध्यास्ते देवैः सह पितामहः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति