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वन पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मणः सदनात्तस्य परं स्थानं प्रकाशते |  १८   क
देवाश्च यत्नात्पश्यन्ति दिव्यं तेजोमय़ं शिवम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति