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वन पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
तेऽभिवाद्यार्ष्टिषेणस्य पादौ धौम्यस्य चैव ह |  २   क
ततः प्राञ्जलय़ः सर्वे व्राह्मणांस्तानपूजय़न् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति