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वन पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
अस्तं प्राप्य ततः सन्ध्यामतिक्रम्य दिवाकरः |  २५   क
उदीचीं भजते काष्ठां दिशमेष विभावसुः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति