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वन पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
वृष्टिमारुतसन्तापैः सुखैः स्थावरजङ्गमान् |  ३४   क
वर्धय़न्सुमहातेजाः पुनः प्रतिनिवर्तते ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति