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वन पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
सन्तता गतिरेतस्य नैष तिष्ठति पाण्डव |  ३६   क
आदाय़ैव तु भूतानां तेजो विसृजते पुनः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति