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वन पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
अतश्चोद्यन्तमादित्यमुपतिष्ठन्ति वै प्रजाः |  ७   क
ऋषय़श्चापि धर्मज्ञाः सिद्धाः साध्याश्च देवताः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति