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उद्योग पर्व
अध्याय १६०
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सञ्जय़ उवाच
यद्वोऽव्रवीद्वाक्यमदीनसत्त्वो; मध्ये कुरूणां हर्षय़न्सत्यसन्धः |  १०   क
अहं हन्ता पाण्डवानामनीकं; शाल्वेय़कांश्चेति ममैष भारः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति