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शान्ति पर्व
अध्याय २३४
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शुक उवाच
लोकवृत्तान्ततत्त्वज्ञः पूतोऽहं गुरुशासनात् |  ४   क
कृत्वा वुद्धिं विय़ुक्तात्मा त्यक्ष्याम्यात्मानमव्यथः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति