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उद्योग पर्व
अध्याय १६०
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सञ्जय़ उवाच
इत्युक्तः कैतवो राजंस्तद्वाक्यमुपधार्य च |  २४   क
अनुज्ञातो निववृते पुनरेव यथागतम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति