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उद्योग पर्व
अध्याय १६०
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सञ्जय़ उवाच
कैतव्य गत्वा भरतान्समेत्य; सुय़ोधनं धार्तराष्ट्रं व्रवीहि |  ९   क
तथेत्याह अर्जुनः सव्यसाची; निशाव्यपाय़े भविता विमर्दः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति