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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
उपर्युपरि राज्ञां वै ज्वलितो भास्करो यथा |  २२   क
युधिष्ठिरं कथं पश्चादनुय़ास्यामि दासवत् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति