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द्रोण पर्व
अध्याय १६०
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सञ्जय़ उवाच
गच्छ त्वमपि कौन्तेय़मात्मार्थेभ्यो हि माचिरम् |  २८   क
त्वमप्याशंससे योद्धुं कुलजः क्षत्रिय़ो ह्यसि ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति