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उद्योग पर्व
अध्याय १७५
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अकृतव्रण उवाच
भवन्तमेव सततं रामः कीर्तय़ति प्रभो |  १२   क
सृञ्जय़ो मे प्रिय़सखो राजर्षिरिति पार्थिव ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति