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द्रोण पर्व
अध्याय १६०
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सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा कथितमत्यन्तं कर्णेन सह हृष्टवत् |  ३२   क
असकृच्छून्यवन्मोहाद्धृतराष्ट्रस्य शृण्वतः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति