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द्रोण पर्व
अध्याय १६०
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सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा समरे द्रोणो न्यवर्तत यतः परे |  ३७   क
द्वैधीकृत्य ततः सेनां युद्धं समभवत्तदा ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति