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द्रोण पर्व
अध्याय १६०
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सञ्जय़ उवाच
सर्वथा परिहीनाः स्म तेजसा च वलेन च |  ४   क
भवता पाल्यमानास्ते विवर्धन्ते पुनः पुनः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति