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वन पर्व
अध्याय २७९
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मार्कण्डेय़ उवाच
स राजा तस्य राजर्षेः कृत्वा पूजां यथार्हतः |  ५   क
वाचा सुनिय़तो भूत्वा चकारात्मनिवेदनम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति