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द्रोण पर्व
अध्याय १६०
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सञ्जय़ उवाच
स भवान्मर्षय़त्येनांस्त्वत्तो भीतान्विशेषतः |  ८   क
शिष्यत्वं वा पुरस्कृत्य मम वा मन्दभाग्यताम् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति