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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
काल्यं घृतं चान्ववेक्षन्प्रय़ता व्रह्मचारिणः |  ३७   क
मङ्गलानपि चापश्यन्व्राह्मणांश्चाप्यपूजय़न् ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति