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शान्ति पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
उद्भूतार्थं हि पुरुषं विशिष्टतरय़ोनय़ः |  १४   क
व्रह्माणमिव भूतानि सततं पर्युपासते ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति