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शान्ति पर्व
अध्याय २७२
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वसिष्ठ उवाच
मा कार्षीः कश्मलं शक्र कश्चिदेवेतरो यथा |  २४   क
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा जहि शत्रुं सुरेश्वर ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति