शान्ति पर्व  अध्याय ५४

वासुदेव उवाच

तस्माद्वक्तव्यमेवेह त्वय़ा पश्याम्यशेषतः |  ३७   क
धर्माञ्शुश्रूषमाणेभ्यः पृष्टेन च सता पुनः ||  ३७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति