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शान्ति पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
समुद्रं चाविशन्त्यन्ये नराः कामेन संय़ुताः |  ३२   क
कामो हि विविधाकारः सर्वं कामेन सन्ततम् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति