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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
क्षणा लवा मुहूर्ताश्च निमेषा युगपर्ययाः |  २३   क
रक्षन्तु सर्वत्र गतं त्वां यादव सुखावहम् |  २३   ख
अरिष्टं गच्छ पन्थानमप्रमत्तो भवानघ ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति