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शान्ति पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो मुहूर्तादथ धर्मराजो; वाक्यानि तेषामनुचिन्त्य सम्यक् |  ४०   क
उवाच वाचावितथं स्मय़न्वै; वहुश्रुतो धर्मभृतां वरिष्ठः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति