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अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
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वासुदेव उवाच
सदा द्विजातीन्सम्पूज्य किं फलं तत्र मानद |  ४   क
एतद्व्रूहि पितः सर्वं सुमहान्संशय़ोऽत्र मे ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति