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कर्ण पर्व
अध्याय ५७
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कर्ण उवाच
स्वप्स्ये वा निहतस्ताभ्यामसत्यो हि रणे जय़ः |  ३६   क
कृतार्थो वा भविष्यामि हत्वा तावथ वा हतः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति