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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
इहैव हर्षोऽस्तु समागतानां; क्षिप्रं कृतास्त्रेण धनञ्जय़ेन |  १२   क
इति व्रुवन्तः परमाशिषस्ते; पार्थास्तपोय़ोगपरा वभूवुः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति