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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा विचित्राणि गिरौ वनानि; किरीटिनं चिन्तय़तामभीक्ष्णम् |  १३   क
वभूव रात्रिर्दिवसश्च तेषां; संवत्सरेणैव समानरूपः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति