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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः कदाचिद्धरिसम्प्रय़ुक्तं; महेन्द्रवाहं सहसोपय़ातम् |  १७   क
विद्युत्प्रभं प्रेक्ष्य महारथानां; हर्षोऽर्जुनं चिन्तय़तां वभूव ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति