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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
स दीप्यमानः सहसान्तरिक्षं; प्रकाशय़न्मातलिसङ्गृहीतः |  १८   क
वभौ महोल्केव घनान्तरस्था; शिखेव चाग्नेर्ज्वलिता विधूमा ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति