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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
तान्वीर्ययुक्तान्सुविशुद्धसत्त्वां; स्तेजस्विनः सत्यधृतिप्रधानान् |  २   क
सम्प्रीय़माणा वहवोऽभिजग्मु; र्गन्धर्वसङ्घाश्च महर्षय़श्च ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति