वन पर्व  अध्याय १६१

वैशम्पाय़न उवाच

स शैलमासाद्य किरीटमाली; महेन्द्रवाहादवरुह्य तस्मात् |  २०   क
धौम्यस्य पादावभिवाद्य पूर्व; मजातशत्रोस्तदनन्तरं च ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति