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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
वृकोदरस्यापि ववन्द पादौ; माद्रीसुताभ्यामभिवादितश्च |  २१   क
समेत्य कृष्णां परिसान्त्व्य चैनां; प्रह्वोऽभवद्भ्रातुरुपह्वरे सः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति