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वन पर्व
अध्याय ११९
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वैशम्पाय़न उवाच
दुर्योधने चापि विवर्धमाने; युधिष्ठिरे चासुख आत्तराज्ये |  ७   क
किं न्वद्य कर्तव्यमिति प्रजाभिः; शङ्का मिथः सञ्जनिता नराणाम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति