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वन पर्व
अध्याय १४८
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वैशम्पाय़न उवाच
भूमिर्नद्यो नगाः शैलाः सिद्धा देवा महर्षय़ः |  ७   क
कालं समनुवर्तन्ते यथा भावा युगे युगे |  ७   ख
वलवर्ष्मप्रभावा हि प्रहीय़न्त्युद्भवन्ति च ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति