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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
ते मातलेश्चक्रुरतीव हृष्टाः; सत्कारमग्र्यं सुरराजतुल्यम् |  २४   क
सर्वं यथावच्च दिवौकसस्ता; न्पप्रच्छुरेनं कुरुराजपुत्राः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति