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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
तानप्यसौ मातलिरभ्यनन्द; त्पितेव पुत्राननुशिष्य चैनान् |  २५   क
यय़ौ रथेनाप्रतिमप्रभेण; पुनः सकाशं त्रिदिवेश्वरस्य ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति