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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं मय़ास्त्राण्युपशिक्षितानि; शक्राच्च वाताच्च शिवाच्च साक्षात् |  २८   क
तथैव शीलेन समाधिना च; प्रीताः सुरा मे सहिताः सहेन्द्राः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति