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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
साक्षात्कुवेरेण कृताश्च तस्मि; न्नगोत्तमे संवृतकूलरोधसः |  ५   क
कादम्वकारण्डवहंसजुष्टाः; पद्माकुलाः पुष्करिणीरपश्यन् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति