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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
यमास्थितः स्थावरजङ्गमानि; विभावसुर्भावय़तेऽमितौजाः |  ९   क
तस्योदय़ं चास्तमय़ं च वीरा; स्तत्र स्थितास्ते ददृशुर्नृसिंहाः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति