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द्रोण पर्व
अध्याय १६१
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सञ्जय़ उवाच
नैव ते न वय़ं राजन्प्रज्ञासिष्म परस्परम् |  १७   क
उद्देशेन हि तेन स्म समय़ुध्यन्त पार्थिवाः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति